अरावली से अरावेलम तक: धबधबा गुफाओं में झलकता इतिहास, भाषा और प्रकृति का अनोखा संगम



भोपाल। राजस्थान की अरावली पर्वत श्रृंखला और गोवा की अरावेलम पहाड़ियों के बीच इतिहास, भूगोल और भाषाई प्रभाव का रोचक संबंध देखने को मिलता है। क्षेत्रीय उच्चारण और भाषाई बदलाव के चलते शब्दों के स्वरूप बदलते रहे हैं, जैसे ऊँचाई से गिरते पानी की आवाज “धब-धब” से बने शब्द "धबधबा" का प्रयोग गोवा में होता है, वहीं भोपाल के निकट बहते जलप्रपात से जुड़े स्थल को "भदभदा" कहा जाता है।

गोवा की लेटराइट चट्टानों में निर्मित अरावेलम की प्राचीन बौद्ध गुफाएँ ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। स्थानीय भाषाई प्रभाव के कारण मूल शब्द "अरावेल" के अंत में “म” प्रत्यय जुड़कर "अरावेलम" बन गया, ठीक उसी तरह जैसे पणजी से पंजिम, बिछोली से बिछोलिम और डबोली से डबोलिम जैसे रूप प्रचलित हुए।
इतिहासकारों के अनुसार अरावली पर्वत क्षेत्र प्राचीन काल में बौद्ध भिक्षुओं के विहार का प्रमुख केंद्र रहा है। अरावली के उत्तर-पश्चिम छोर पर सम्राट अशोक द्वारा निर्मित महाविहार और लघु शिलालेख का उल्लेख मिलता है, जिसे “बहापुर लघु शिलालेख” के नाम से जाना जाता है। यह स्थल कालकाजी और लोटस टेम्पल के निकट स्थित है और 1966 में खोजा गया था। वहीं अरावली श्रृंखला के दक्षिण-पश्चिम में स्थित माउंट आबू को भी प्राचीन विहार क्षेत्र माना जाता है।

भाषावैज्ञानिक दृष्टि से "अरावली" शब्द को “अर” और “वली” से बना माना जाता है, जहाँ “अर” का अर्थ आरा या चक्र की तीली तथा “वली” का अर्थ मार्ग या रेखा से जोड़ा जाता है। इस प्रकार इसे अर्हतों के विहार क्षेत्र या मार्ग से भी संबद्ध किया जाता है।
गोवा के अरावेलम क्षेत्र में एक ही परिसर में सुरक्षित तीन चैत्य गुफाएँ और एक विहार कुटी पाई जाती है, जिनकी निर्माण शैली महाराष्ट्र की बौद्ध गुफाओं से साम्यता रखती है। गुफाओं के समीप स्थित सुंदर जलप्रपात से गिरते पानी की “धब-धब” ध्वनि के कारण इन्हें बोलचाल में धबधबा गुफाएँ भी कहा जाता है।

इस प्रकार अरावली से अरावेलम तक का संबंध केवल भौगोलिक ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, भाषाई और सांस्कृतिक निरंतरता का भी प्रतीक है, जहाँ प्रकृति, ध्वनि और परंपरा मिलकर अतीत की झलक प्रस्तुत करती हैं।

Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.