खाकी पर सवाल या भरोसे की ज़रूरत ?

हितेश जैन। समाज में जब भी कोई अपराध घटित होता है, सबसे पहले उंगली पुलिस व्यवस्था पर उठती है। परंतु यह समझना आवश्यक है कि पुलिस अपराधियों की मानसिकता को बदलने का माध्यम नहीं है और न ही अपराध होने से पहले हर घटना का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। पुलिस का कार्य अपराध होने के बाद त्वरित कार्रवाई कर कानून व्यवस्था बनाए रखना और समाज में सुरक्षा का विश्वास कायम करना है।

पुलिस केवल घटनाओं की गिनती करने का काम नहीं करती, बल्कि नागरिकों को सुरक्षित वातावरण का आभास भी कराती है। ऐसे में हर घटना के बाद पुलिस पर प्रश्नचिह्न लगाना उचित नहीं कहा जा सकता। हाल ही में अपराध की घटना के बाद महज़ कुछ ही घंटों में आरोपियों को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे पहुंचाने वाली टीम और पूरी योजना का नेतृत्व करने वाले पुलिस अधीक्षक अमन सिंह राठौर की कार्यशैली सराहनीय है।

यदि समाज में अपराध ही न हों तो पुलिस की भूमिका सीमित हो जाएगी, पर वास्तविकता यह है कि अपराधी प्रवृत्ति को कानून के दायरे में लाना ही पुलिस का कर्तव्य है। अपराधी अपने कृत्य के बाद न्यायालय की कठोर प्रक्रिया का सामना करता है और कई बार उसे अपने अपराध पर पछतावा भी होता है।

जिले में कानून व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए थानों की कमान संभाल रहे निरीक्षक और पुलिसकर्मी निरंतर अपराधियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई कर रहे हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि समाज आखिर पुलिस से अपेक्षा क्या रखता है, पूर्ण अपराधमुक्त व्यवस्था या हर चुनौती के बीच त्वरित और प्रभावी कार्रवाई?

यह भी विचारणीय है कि अपराधियों का कोई समाज नहीं होता। उनसे रिश्तेदारी या व्यक्तिगत जुड़ाव के आधार पर पुलिस की कार्यवाही पर सवाल खड़े करना न्यायोचित नहीं है। समाज और पुलिस के बीच विश्वास और सहयोग ही कानून व्यवस्था को सुदृढ़ बना सकता है।

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