मोहन कॉलोनी में स्थित भगवान आदिनाथ मंदिर में आचार्य पुलक सागरजी ने भास्कर के साथ प्रवचन साझा करते हुए कोरोना वायरस को लेकर कहा कि प्रधानमंत्री ने 21 दिनों तक देश में कर्फ्यू लगाया है। इसका अच्छे से पालन करो। इसे इसे कानून का दबाव नहीं समझो। साथ ही आचार्य जी ने कहा कि मैं अपेक्षा करता हूं कि सभी लोग मंदिर में न आए। घरों में रहकर ही पूजा पाठ करें। घर को ही मंदिर बना लो। कोरोना ने आपको घर में रहने का अवसर दिया है। इसलिए घर में रहकर आप यह भी समझोगे की घर में महिला किस तरह खाना बनाती है, बच्चों को खिलाना, सफाई करना ये भी आप जान जाओगे। साथ ही आप भी घर में रहकर काम में हाथ बंटाना है। घर में ही बैठकर भगवान के भजन कीर्तन कीजिए। पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाए। 21 दिनों तक घर में रहकर साहित्य पढ़ो, अच्छे किताबें पढ़ो, भगवान का नाम लो। घर को ही स्वर्ग बना दो।
आचार्य जी ने कहा कि बिना उद्देश्य के जीवन जीना बेईमानी है। आचार्य जी ने कहा कि मरण को नहीं जीवन को सुधारना है। जिनका जीवन सुधर जाता है उसका मरण भी सुधर जाता है। जिनका जीवन मंगल हो जाता है उनकी मृत्यु भी मंगल हो जाती है। आचार्य जी ने कहा कि मृत्यु तो महोत्सव है बेशर्ते की जीवन उत्सव रहा हो। जन्म और मृत्यु एक ही सिक्के के दो पहलू है। मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है। मौत से कभी डरना नहीं बल्कि मृत्यु से लड़ना है। सांझ हो तो दीपक जला लेना। क्योंकि सांझ तो होनी ही है, लेकिन अगर दीपक जला लो तो फिर हर रस्ता पार हो जाता है। यहां सांझ का तात्पर्य जीवन से है और दीपक का तात्पर्य धर्म से है। अगर जीवन में धर्म ध्यान हो तो फिर मृत्यु भी शुभ हो जाती है। आचार्य जी ने कहा कि चिता जले उससे पहले चेतना जला लेना। जिनकी चिता से पहले चेतना जला लेते हैं उनकी कभी चिता नहीं जला करती है। आचार्य जी ने कहा कि चेतना धर्म ध्यान से ही जागती है। सिनेमा के पर्दे पर जो दिखता है वह छाया हैं। जो अंतकरण में दिखता है वह माया है। माया की छाया अगर चेतना पर पड़ जाती है तो चेतना मूर्छित हो जाती है। आचार्य जी ने कहा जीवन बहुत छोटा है। लेकिन इसे खाने पीने के लिए ही नहीं जीना चाहिए। खाना पीना तो पशु भी करते हैं फिर आप में और पशुओं में क्या अंतर रह जाएगा। आचार्य जी ने कहा जिस तरह मनुष्य रोटी के बगैर नहीं रह सकता है। उसी प्रकार आत्मा के लिए भगवान का नाम लेना बहुत जरूरी है। आचार्य जी ने कहा कि संत समाज के सुधार के लिए होते हैं। अगर संतों से कुछ पाना है तो फिर आप संतों के चरणों में अपने अस्तित्व को रख दो। अगर भगवान को पाना है तो अपने जीवन में अहंकार को लेकर कभी भी भगवान के मंदिर में मत जाना नहीं तो भगवान तुम्हें कभी प्राप्त नहीं हो सकेगा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
