राजनीतिक हलचल: सभी राजनैतिक दलों की एक ही मंशा होती है सत्ताधीश होना,फिर चाहे तरीका जो भी हो । मध्यप्रदेश की राजनीति के वो सत्रह दिन कांग्रेस को गहरे ज़ख्म देकर गए तो भाजपा के लिए सत्ता सुख । सूबे की सत्ता को खोने और पाने के बाद कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए ही नगरीय निकाय चुनाव चुनौती पूर्ण दिखाई दे रहे हैं, भारतीय जनता पार्टी को विधानसभा उपचुनाव में मिली प्रचंड जीत के बाद न केवल सिंधिया और सिंधियाई विधायकों को सामंजस्य के साथ अपने साथ लेकर चलना है बल्कि सिंधिया के साथ आई फौज जो कि नवागत भाजपाई के रूप में पहचाने जाते हैं, को साधना मुश्किल लग रहा है क्योंकि मूल भाजपाई से अधिक संख्या में सिंधियाई कार्यकर्ताओं की फेरिहस्त है जो नगरीय निकाय चुनाव में अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं । वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस अभी 15 महीने के सत्ता सुख के बाद सत्ता से बेदखली के दर्द को लेकर कोप भवन से बाहर नहीं निकली कि युवा कांग्रेस के चुनावों ने संगठन में बिखराव खड़ा कर दिया और यही बिखराव अब नगरीय निकाय चुनाव में कांग्रेस के लिए मुसीबत बनता दिखाई दे रहा है, दरअसल विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस को मिली करारी शिकस्त के बाद आरोप प्रत्यारोप लग रहे हैं लेकिन प्रत्याशी चयन में एकराय अभी बन पाना मुश्किल लग रहा है, कांग्रेस के पास कार्यकर्ताओं की कमी है ऐसे में जिताऊ उम्मीदवार की तलाश भी जारी है, कांग्रेस निकाय चुनाव में जीत हासिल करने के लिए अन्य दल से किसी मजबूत व्यक्तित्व को आयतित भी कर सकती है ।
