शिवपुरी। गरीबी, पथरीली जमीन और मजबूरी में होने वाले पलायन के बीच पोहरी ब्लॉक के आदिवासी परिवारों ने स्वरोजगार की ऐसी राह चुनी है, जिसने न केवल उनकी आर्थिक स्थिति बदली बल्कि उनके बच्चों को कुपोषण के चंगुल से भी बाहर निकाल लिया। ग्राम पंचायत नौंहेटा खुर्द के पटपरी गांव निवासी जगन्नाथ आदिवासी का परिवार इसका जीवंत उदाहरण है, जिन्होंने मुर्गीपालन को तरक्की और बेहतर स्वास्थ्य का जरिया बनाया।
15 गांवों में अभियान, 2400 परिवारों को मिला लाभ
यह बदलाव चाइल्ड राइट्स एंड यू (CRY) के सहयोग से विकास संवाद द्वारा संचालित ‘समुदाय आधारित कुपोषण प्रबंधन परियोजना’ के माध्यम से आ रहा है। परियोजना के बारे में जानकारी देते हुए जिला समन्वयक अजय यादव ने बताया कि पशुपालन विभाग के सहयोग से पोहरी ब्लॉक के 15 ग्रामों में कुल 2400 परिवारों को चिन्हित कर प्रत्येक परिवार को 45-45 चूजे उपलब्ध कराए गए हैं। इसका उद्देश्य परिवारों की आय बढ़ाने के साथ-साथ उनके भोजन में अंडे और मांस के रूप में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाकर पोषण स्तर में सुधार लाना है।
रोजगार के अभाव में करना पड़ता था पलायन
जगन्नाथ का 13 सदस्यों का परिवार लंबे समय से आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। उनके पास 5 बीघा पथरीली जमीन है, जहां खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर थी। फसल न होने पर परिवार को मजदूरी के लिए अन्य राज्यों में पलायन करना पड़ता था। वहां रहने और भोजन की उचित व्यवस्था न होने से बच्चों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता था और वे अक्सर बीमार रहते थे।
कुपोषण की जंग जीती नन्ही पूर्वी ने
मुर्गीपालन का सकारात्मक असर जगन्नाथ की पोती पूर्वी के स्वास्थ्य पर भी देखने को मिला। जून 2025 में 8 माह की उम्र में पूर्वी गंभीर कुपोषण का शिकार थी और उसका वजन मात्र 5 किलो 600 ग्राम था। पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) से उपचार के बाद उसे नियमित रूप से एक अंडा खिलाना शुरू किया गया। प्रोटीनयुक्त आहार का असर यह हुआ कि कुछ ही महीनों में उसका स्वास्थ्य सुधर गया और 14 माह की उम्र में उसका वजन बढ़कर 8 किलो 100 ग्राम हो गया। आज पूर्वी पूरी तरह स्वस्थ श्रेणी में है।
आर्थिक मजबूती: गांव में ही मिला रोजगार
मुर्गीपालन से आर्थिक स्थिति में भी सुधार आया। जगन्नाथ ने 15 मुर्गों को 500 से 800 रुपये प्रति मुर्गा बेचकर करीब 10 हजार रुपये की आय अर्जित की। इस राशि का उपयोग परिवार की जरूरतों और इलाज में किया गया। परिवार के सदस्यों ने पिछले तीन वर्षों में नियमित रूप से अंडों का सेवन किया, जो पहले बाजार से खरीदकर संभव नहीं था। अनुमानतः उन्होंने करीब 7 हजार रुपये के अंडों का पोषण लाभ स्वयं के उत्पादन से लिया।
जगन्नाथ का कहना है कि मुर्गीपालन से उनके परिवार के पोषण, रोजगार और स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार हुआ है और अब उन्हें पलायन की मजबूरी से राहत मिली है।