सत्ता, संस्कार और संवेदना : सोनिया गांधी और सुनेत्रा पवार का तुलनात्मक दृष्टिकोण



भारतीय राजनीति में नेताओं से अधिक, कई बार उनके आचरण और निर्णय इतिहास में दर्ज होते हैं। सोनिया गांधी और सुनेत्रा पवार—दोनों अलग-अलग पृष्ठभूमि से आईं, लेकिन उनके जीवन के निर्णायक क्षणों में लिए गए फैसले उन्हें एक-दूसरे से बिल्कुल अलग पंक्ति में खड़ा करते हैं।

सोनिया गांधी, जिन्हें लंबे समय तक “विदेशी मूल” कहकर अपमानित किया गया, उन्होंने न केवल भारतीय संस्कृति को समझा बल्कि उसे पूरे सम्मान और गरिमा के साथ अपनाया। साड़ी, सिंदूर, भारतीय रीति-रिवाज—ये उनके लिए केवल प्रतीक नहीं रहे, बल्कि एक सांस्कृतिक स्वीकार्यता का माध्यम बने। राजीव गांधी की असामयिक और दर्दनाक हत्या के बाद भी उन्होंने स्वयं को सत्ता से दूर रखा। उस समय देश की सहानुभूति, पार्टी का दबाव और राजनीतिक अवसर—सब कुछ उनके पक्ष में था, फिर भी उन्होंने संयम और संवेदना को चुना।

2004 में भी, जब वे निर्विवाद रूप से प्रधानमंत्री बन सकती थीं, उन्होंने पद ठुकराकर यह स्पष्ट किया कि सत्ता ही सब कुछ नहीं होती। यह निर्णय भारतीय राजनीति में आज भी एक दुर्लभ उदाहरण माना जाता है।

इसके विपरीत, सुनेत्रा पवार का मामला सवाल खड़े करता है। वे भारतीय हैं, परंपराओं और सामाजिक रीति-रिवाजों से परिचित भी। इसके बावजूद पति के निधन के मात्र तीसरे दिन डिप्टी मुख्यमंत्री की शपथ लेने पहुँचना, भारतीय समाज की उस परंपरा के विपरीत है जिसमें शोक की अवधि को संयम, आत्मचिंतन और विराम का समय माना जाता है। जब समाज स्वयं 13 दिनों तक शुभ कार्यों से विरत रहता है, तब सत्ता की इतनी शीघ्रता असहज प्रतीत होती है।

यह भी तथ्य है कि सुनेत्रा पवार का राजनीतिक जीवन स्वयं की वैचारिक यात्रा से कम और पारिवारिक राजनीतिक विरासत से अधिक जुड़ा दिखता है। राज्यसभा में हालिया प्रवेश और फिर त्वरित रूप से सत्ता के शीर्ष पद तक पहुँचना, राजनीति में अवसरवाद बनाम आदर्शवाद की बहस को फिर जीवित करता है।

यह लेख किसी व्यक्ति विशेष पर व्यक्तिगत आक्षेप नहीं, बल्कि यह प्रश्न उठाता है कि राजनीति में संवेदना, संस्कार और मर्यादा की भूमिका क्या होनी चाहिए। सोनिया गांधी का उदाहरण बताता है कि सत्ता को ठुकराकर भी सम्मान अर्जित किया जा सकता है, जबकि जल्दबाज़ी में लिया गया निर्णय सामाजिक मूल्यों से टकरा सकता है।

आज जब राजनीति में नैतिकता दुर्लभ होती जा रही है, तब नेताओं की पत्नियों सहित सार्वजनिक जीवन में आने वाली महिलाओं के लिए यह आवश्यक है कि वे केवल पद नहीं, बल्कि परंपरा, संस्कृति और सामाजिक भावनाओं को भी साथ लेकर चलें।

क्योंकि इतिहास केवल यह नहीं देखता कि कौन सत्ता में पहुँचा, बल्कि यह भी याद रखता है कि किसने सत्ता से ऊपर संस्कार को रखा

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